कानपुर चमनगंज का मो0 अली पार्क बना दूसरा शाहीन बाग

कानपुर– कानपुर का सबसे घनी मुस्लिम आबादी वाला इलाका, जिसे चमनगंज के नाम से जाना जाता है। तंग गलिया बदहाल स्वसाथ्य व्यवस्था और लोगो मे शिक्षा के प्रति जगरूकता विशेष कर महिलाये की कमी यह भी चमनगंज की एक पहचान है।

चमनगंज ने बीते चार दिनों में हिम्मत और साहस का जो परिचय दिया है। वह हैरान करने वाला है समूचे देश में नागरिकता संशोधन कानून, एनआरसी और एनपीआर को लेकर आंदोलन शुरु हो गया। देश के निगाहे उत्तर प्रदेश के आंदोलन पर टिक गई जिसने हिसंक रूप ले लिया था। जिसमे कई लोगों की जानें भी चली गईं, जिसमे पुलिस पर आरोप है कि लोगो की जान पुलिस की गोली लगने से गई कई लोगों की संपत्तियों को भी पुलिस के द्वारा नुकसान पहुंचाने का आरोप है सैकड़ों की संख्या में गिरफ्तारियां हुईं और यूपी पुलिस एवं राज्य सरकार पर लोगों की आवाज़ दबाने का आरोप लगा।

 

बीती 20 व 21 दिसम्बर को कानपुर के यतीमखाना व बाबूपुरवा मे भी विरोध प्रदर्शन हुआ जिसमे हिंसा हुई और 3 लोगो की जान चली गई जिसके बाद सवाल उठने लगे कि क्या बिना हिंसा के विरोध प्रदर्शन व आन्दोलन कानपुर मे नही होगा कानपुर मे विरोध होगा भी या नही।

कानपुर के चमनगंज स्थित मुहम्मद अली पार्क में बीते चार दिनों से चल रहे धरना प्रदर्शन ने इन सब सवालों का मुंहतोड़ जवाब तो दिया है साथ ही चमनगंज की जनता ने क्षेत्र के लोगों के प्रति जो आम धारणा बनी हुई थी उसे भी गलत साबित कर दिया। विशेषकर महिलाओं ने। जिन महिलाओं को अनपढ़ समझा जाता था। जिन्हें देश की राजनीति पर चर्चा करते हुए शायद ही कभी देखा गया हो उन महिलाओं का साहस हैरान करने वाला है। केवल धरना स्थल पर पहुंचकर भीड जमा करना मात्र काम नही कर रही महिलाएं बल्कि हज़ारों की भीड़ में माइक पकड़कर बोलने का काम भी कर रही है। कोई नज़्म गाती, कोई संविधान को बचाने की गुहार करती, तो कोई अपने नारों से सरकार को ललकारती हुई देखी जा सकती है। जिन महिलाओं ने कभी सामाजिक मुद्दों पर अपनी राय नहीं रखी, जिन महिलाओं को खान पकाने और बच्चे सम्भालने से फुर्सत नही उन महिलाओं के अंदर इतना आत्मविश्वास और हिम्मत आश्चर्यचकित कर देती है। यह महिलाएं बीत चार दिनों से लगातार समय पर पहुंच जाती हैं फिर चाहे बारिश हो या रूह कपा देनी वाली ठंड हो। इनको वहां आने से कोई नहीं रोक पाता। पूरे समय अनुशासन के साथ धरने पर बैठकर अपने इंकलाबी भाषण, नज़्म, गीत और नारों के साथ वह सरकार को यह संदेश देने से नहीं चूकतीं कि यह कानूर हमे मंजूर नही। नमाज़ का समय होने पर बड़े आराम से वहीं नमाज़ भी अदा हो जाती है। जगह कम होने के बावजूद कोई हड़बड़ या भगदड़ नहीं होती। बड़े आराम से एक दूसरे को जगह और सम्मान देते हुए यह महिलाएं इस अनिश्चितकालीन धरने को सफल बनाने में कोई कसर नहीं छोड़तीं। कुछ लोगों का मानना है कि यह चमनगंज दूसरा शाहीन बाग बन गया है और यह अभी शुरुआत है जिसके बाद यूपी के और शहरों में भी यही नज़ारा देखने को मिलेगा।